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Saturday, 28 June 2014

Story of a 'Madrasi'!


I wrote this originally in Hindi thinking that if an article which in principle disagrees with the recent note from the Government of India to ensure primacy of Hindi as a language of governance were in Hindi, it would be quite cheeky and in principle, apt. Those who missed it may check here!  However many friends, especially Mr. Husain Sadar of Canada suggested that if the same may be translated and posted, it would be useful for people who cannot read/write Hindi but are equally interested in this issue. So here goes! Thank you Mr.Sadar.


A few words about me to start with! My mother tongue is Tamil and despite this, I am not a foreigner. I am an Indian and possibly as much an Indian as you, whose mother tongue is Hindi. If you are confused with my above statements, I don’t blame you as this discussion leaves me in such a state too. You would have noticed it often and this was making headlines recently too that Hindi language should be given primacy in all government work. You would have also noted various views expressed on this subject, some in its favour and some otherwise, some in civil words and some…………………sigh!

Our history is witness to the importance Language or Languages have in our society. From Linguistic based reorganization of states to pro and anti-language agitations, we have seen all. People have sacrificed their lives on this issue and from the looks of it would seems that they are quite willing to sacrifice as well as take a few lives too. This is reason enough to ensure that whenever we have a debate on such issues, we do it sanely and objectively sans emotions. “Unity in diversity” is one mantra which is taught right from our primary schools the way a mother would feed her new born. Our Constitution is primarily based on celebrating this diversity. Among the various instances of diversity in this country, Language possibly takes the first and most important position. They say, in India “कोस कोस पर पानी बदले, चार कोस पे वाणी", meaning  “Taste of water changes every mile, and the language every four”! In such a social cauldron, it is imperative that any decision which can jeopardize the plurality of our society should not be taken with narrow political gains in mind.

It has often been said of people like me especially by the folks up in the northern part of India that we ‘Madrasis’ don’t know Hindi and we take special pride in being ‘Anti-Hindi!’. “’Madrasi’ doesn’t know Hindi, has no enthusiasm to learn it too, should someone be interested they wouldn’t permit it, even if he knows Hindi he would deliberately feign ignorance of it!” I am sure most of you would have used the above lines or heard the same being said some time or the other in life. I for one am tired of it! Very very discriminatory indeed! I mean have you ever heard a ‘Madrasi’ on reaching Delhi complain, “This ‘Hindiwala’ doesn’t know Tamil, Doesn’t want to learn Malayalam either, If someone wants to learn Telugu he is discouraged, even if he knows Kannada he would deliberately feign ignorance of it!” (My dear countrymen: Did you just notice the diversity that exists even within what you think is a homogeneous ‘Madrasi’? Welcome!) And this is not restricted to ‘Madrasi’ alone. My other friends who subscribes to Bengali, Oriya, Ahomiya, Gujrati, Marathi etc as their mother tongue are feeling the same way!

I am not only a South Indian whose mother tongue is not Hindi but I also reside in South India where the usage of Hindi is not very popular. The primacy of Tamil in Tamilnadu or Marathi in Maharashtra is after all expected and should be so too. Despite this handicap, today my children study Hindi in their school. Do you know why? Because it is a voluntary decision and not because Hindi is being imposed on us. Our belief is  we will anyway end up learning our mother tongue/regional language, with the International language English being mandatory, knowing Hindi opens up for us opportunities in those parts of the country where this language dominates! In short for economic gains and opportunity, not for any special love that we have for Hindi. While you keep debating emotional appeal of Hindi, we ‘Madrasis’ are already learning the language and it is but a matter of time when we will swarm all over the Hindi heartland. The moot question my friends though is when will you learn ‘Madrasi’!


Q: Do you know which institution has rendered yeoman service to popularize Hindi in Tamilnadu?
A: ………………………………………………………Bollywood!

Madrasi: An term used to describe South Indians. The present day South India was one administrative unit called Madras Presidency during the days of British Raj in India!

Thank you @atiyaz for "कोस कोस पर पानी बदले, चार कोस पे वाणी"!

Thursday, 26 June 2014

एक 'मद्रासी' की कहानी!

सबसे पहले कुछ अपने बारे में! कृपया आश्चर्य करें पर मेरी मातृ भाषा तमिल हैं और मैं कोई विदेशी नहीं हूँ! में भी भारतीय हूँ और उतना ही भारतीय जितना की आप, जिनकी मातृ भाषा हिंदी हैंअगर आप  मेरे इन शब्दों से परेशान हैं अथवा मेरे वाक्य आपको समझ नहीं रहें हैं तो जान लीजिये की आपकी अवस्था भी बिलकुल मेरी ही तरह हैं! आपने अक्सर देखा और पढ़ा होगा और यह हाल फिलाल में सुर्खियां भी बानी की इस देश में हिंदी भाषा को सरकारी कार्यों में प्राथमिक्ता  देनी चाहिए| इस विशय पर अनेक टिप्पणियां भी आई, कुछ इस विषय के पक्ष में और कुछ इसके विपक्ष में, कुछ सभ्य शब्दों में और कुछ...................................खैर छोड़िये!

इतिहास गवाह हैं की इस देश में भाषा और भाषाओँ का बहुत महत्व हैं| भाषा के आधार पर राज्यों के विभाजन से ले कर भाषाओँ के पक्ष में एवं  भाषाओँ के ज़बरदस्ती थोपने के खिलाफ आंदोलन तक, हमने सब देखा हैं| लोगों ने इस मुद्दे पर अपनी जान तक कुर्बान की हैं और शायद आज भी लोग इस मुद्दे पर जान देने और जान लेने के काबिल हैं| यह एक वजह काफी हैं के हम जब भी इस विशय पर कोई भी चर्चा करें तो तनिक सावधानी और ठन्डे दिमाग से करें| "अनेकता में एकता" एक ऐसा मंत्र हैं जिसे  देश के पाठशालाओं में बच्चों को इस तरह सिखाया जाता हैं जैसे कोई माँ अपने बच्चे को उसके जन्म पर अपना दूध पिला रही हो! हमारा संविधान भी देश के इसी मूल मंत्र पर आधारित हैं| इस देश के अनेक किस्म के भिन्नताओं में भाषा की एहमियत शायद सर्वोपरि हैं| कहते हैं इस देश के "कोस कोस पर पानी बदले, चार कोस पे वाणी"! इस स्तिथि में अनिवार्य हैं की हर वह निर्णय जिस से हमारे विविधता पर कोई आंच सके, उनका प्रयोग मात्र भावनाओं में डूब कर या राजनितिक फायदों के लिए लियें जायें
मेरा भा.......षा महान!

यह अक्सर कहा जाता हैं मेरे जैसों के बारे में, खासकर उत्तर भारत के प्रांतों में की हम 'मद्रासी' हिंदी नहीं जानते और हम 'मद्रासियों' में हिंदी के खिलाफ विशेष लगाव हैं! "'मद्रासी' हिंदी नहीं जानता, कोई हिंदी सीखना भी नहीं चाहता, कोई हिंदी सीखना भी चाहे तो उन्हें सिखाया नहीं जाता, हिंदी जानता भी हो तो जान बूझकर हिंदी का प्रयोग नहीं करता!" मुझे यकीन हैं के आप सब ने इन शब्दों का प्रयोग कभी कभी किया होगा या करते हुए सुना होगा! मैं तो इन शब्दों को सुन सुन कर थक गया हूँ| बहुत नाइंसाफी हैं यह! क्या आपने कभी किसी 'मद्रासी' को दिल्ली आकर यह कहते सुना हैं की "यह 'हिंदीवाला' तमिल नहीं जानता, मलयालम सीखना भी नहीं चाहता, तेलुगु सीखना चाहे तो कोई सिखाता नहीं हैं, कन्नड़ा जानता भी हो तो जान बूझकर उसका प्रयोग नहीं करता!" (मेरे अज़ीज़ हमवतनों: देखा आपने? हम 'मद्रासियों' में ही कितनी विविधता हैं? वेलकम!) और यह सिर्फ 'मद्रासियों' तक ही सीमित नहीं. मेरे मित्रगण जो बांग्ला, ओड़िया,अहोमिया,गुजरती,मराठी, कोंकणी इत्यादि इत्यादि भाषी हैं, शायद वह भी इस वक़्त ऐसा ही सोच रहें होंगे!

अनेकता में एकता!

मैं केवल एक दक्षिण भारतीय हूँ जिसकी मातृ भाषा हिंदी नहीं हैं बल्कि में रहता भी दक्षिण भारत में हूँ जहाँ हिंदी भाषा का प्रयोग ज़्यादा नहीं हैं| तमिलनाडु में तमिल का या महाराष्ट्र में मराठी का उपयोग ज़्यादा होना तो स्वाभाविक सी बात हैं, होनी भी चाहिए. इसके बावजूद मेरे दोनों बच्चे आज अपने विध्यालय में  हिंदी भाषा सीख रहें हैं. जानते हैं क्यों? क्योंकि हम पर हिंदी पढ़ने की कोई ज़बरदस्ती नहीं हैं. हमारा मानना हैं की हमारी प्रांतीय एवं मातृ भाषा तो हम सीख ही लेंगे, अंतराष्ट्रीय भाषा  अंग्रेजी तो अनिवार्य हैं, हिंदी सीखने से हमें देश के अन्य प्रांतों में भी काम करने का अवसर मिल सकता हैं. अर्थार्थ कोई नेकी या हिंदी पर कोई विशेष प्रेम नहीं बल्कि सीधे सीधे स्वार्थ, आर्थिक लाभ उठाने का स्वार्थ. आप हमें क्या हिंदी सिखाएंगे जनाब! हम तो वैसे हे सीख रहें हैं और दिल्ली पर भी धावा बोल ही देंगे एक एक दिन. पर आप कब 'मद्रासी' सीखोगे बंधू?



प्र: जानते हैं तमिलनाडु में हिंदी को फैलाने का कार्य सबसे ज्यादा किस संस्था ने किया हैं?
: .............................................बॉलीवुड ने!

शुक्रियां अतिया ज़ैदी जी @atiyaz -à "कोस कोस पर पानी बदले, चार कोस पे वाणी"! के लिए


atiya zaidi @atiyaz · Jun 20
Which Hindi r we talking about? Bhojpuri?Awadhi?Maithli? Chhatisgarhi?Haryanvi?Dakkani? Pahadi?Maghai?Rajasthani? Khari Boli?Bambaiya?..1/3
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